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Encyclopedia

 Encyclopaedia, also spelled encyclopedia, reference work that contains information on all branches of knowledge or that treats a particular branch of knowledge in a comprehensive manner.


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1. Encyclopedia of African Region

2. Encyclopaedia of Psychology and Religion 

3. Encyclopedia of Greek and Roman Mythology








Shri RamCharitManas

 


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रामचरितमानस न केवल तुलसीदास के बारह प्रामाणिक ग्रंथों में सर्वश्रेष्ठ है, वरन् समग्र हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ गौरव ग्रंथ है, इसे भारतीय संस्कृति का विश्वकोश कहा जाता है। इस ग्रंथ का साहित्य, दर्शन, आचारशास्त्र, शिक्षा, समाज-सुधार, साहित्यिक, मनोरंजन आदि कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है.


Ramcharitmanas is not only the best of the twelve authentic texts of Tulsidas, but also the best pride book of the entire Hindi literature, it is called the encyclopedia of Indian culture. Literature, philosophy, ethics, education, social-reform, literary, entertainment etc. of this book is important from many points of view.


रामचरितमानसः न केवलं तुलसीदासस्य द्वादश प्रामाणिकग्रन्थानां श्रेष्ठतमः, अपितु सम्पूर्णस्य हिन्दीसाहित्यस्य उत्तमः गौरवग्रन्थः अपि अस्ति, भारतीयसंस्कृतेः विश्वकोशः इति कथ्यते । अस्य ग्रन्थस्य साहित्यं, दर्शनं, नीतिशास्त्रं, शिक्षा, समाज-सुधारः, साहित्यिकं, मनोरञ्जनं इत्यादयः अनेकदृष्ट्या महत्त्वपूर्णाः सन्ति।

Scientific Extract from Vedas

 


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सरल शब्दों में कहा जाए तो वेद भारतीय और विशेषकर हिन्दू धर्म के वे ग्रंथ हैं। इनमें ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, औषधि, प्रकर्ति, खगोल शास्त्र और इन सबसे संबन्धित सभी विषयों के ज्ञान का अकूत भंडार भरा पड़ा है। ऋषि-मुनियों द्वारा रचे वेद हिन्दू संस्कृति की रीढ़ माने जाते हैं। 


In simple words, Vedas are the texts of Indian and especially Hindu religion. In these, there is a huge store of knowledge of astrology, mathematics, science, religion, medicine, nature, astronomy and all these related subjects. The Vedas composed by sages are considered the backbone of Hindu culture.


सरलशब्देषु वेदाः भारतीयस्य विशेषतः हिन्दुधर्मस्य च ग्रन्थाः सन्ति । एतेषु ज्योतिष-गणित-विज्ञान-धर्म-चिकित्सा-प्रकृति-खगोलशास्त्र-एतेषां सर्वेषां तत्सम्बद्धानां विषयाणां ज्ञानानां विशालः सञ्चयः अस्ति । ऋषिभिः निर्मिताः वेदाः हिन्दुसंस्कृतेः मेरुदण्डः इति मन्यन्ते ।

Ved

 


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वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यता को जानने का वेद ही तो एकमात्र साधन है। मानव-जाति और विशेषतः वैदिकों ने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ (पुस्तक) माना जाता है।
वेद चार प्रकार के होते हैं - ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। प्राचीन भारतीय इतिहास के सर्वोत्तम स्रोतों में से एक वैदिक साहित्य है। वेदों ने भारतीय शास्त्र का निर्माण किया है। वैदिक धर्म के विचारों और प्रथाओं को वेदों द्वारा संहिताबद्ध किया गया है और वे शास्त्रीय हिंदू धर्म का आधार भी बनाते हैं।
ऋग्वेद - वेद का प्राचीनतम रूप है
सामवेद -  गायन के लिए सबसे प्रारंभिक संदर्भ
यजुर्वेद - इसे प्रार्थनाओं का ग्रंथ भी कहा जाता है
अथर्ववेद - जादू और आकर्षण की किताब

Vedas are the only means of knowing the culture and civilization of the Aryans of the Vedic age. The knowledge of how the human race and especially the Vedics developed religion and society in their childhood is only available from the Vedas. In the literature of the world, it is considered to be the oldest book.
There are four types of Vedas - Rigveda, Samaveda, Yajurveda and Atharvaveda. One of the best sources of ancient Indian history is Vedic literature. The Vedas have formed the Indian scriptures. The ideas and practices of Vedic religion are codified by the Vedas and they also form the basis of classical Hinduism.
Rigveda - the oldest form of Veda
Samaveda - the earliest reference to singing
Yajurveda - also called the book of prayers
Atharvaveda - Book of Magic and Charms


वैदिकयुगस्य आर्याणां संस्कृतिं सभ्यतां च ज्ञातुं वेदमेव साधनम् अस्ति । मानवजातेः विशेषतः वैदिकानां च बाल्यकाले धर्मसमाजस्य विकासः कथं जातः इति ज्ञानं केवलं वेदेभ्यः एव उपलभ्यते । विश्वस्य साहित्ये प्राचीनतमं पुस्तकं मन्यते ।
वेदाः चतुर्विधाः सन्ति - ऋग्वेदः, सामवेदः, यजुर्वेदः, अथर्ववेदः च । प्राचीनभारतीय-इतिहासस्य उत्तम-स्रोतेषु अन्यतमं वैदिक-साहित्यम् अस्ति । वेदैः भारतीयशास्त्रं निर्मितम् अस्ति । वैदिकधर्मस्य विचाराः व्यवहाराः च वेदैः संहिताकृताः सन्ति तथा च ते शास्त्रीयहिन्दुधर्मस्य आधारः अपि भवन्ति ।
ऋग्वेद - वेद का प्राचीनतम रूप
सामवेद - गायनस्य प्रारम्भिकः सन्दर्भः
यजुर्वेद - प्रार्थना पुस्तक भी उच्यते
अथर्ववेद - आकर्षण पुस्तक

Spirituality

 


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आध्यात्मिकता (Spirituality) का संबन्ध मनुष्य के आंतरिक जीवन से है और इसकी शुरुआत होती है-- उसकी अंतर्यात्रा से। वे सभी गतिविधियाँ, जो मनुष्य को परिष्कृत, निर्मल बनाती हैं, आनन्द से भरपूर करती हैं, पूर्णता का एहसास देती हैं, वे सब आध्यात्म के अन्दर आती हैं ।


Spirituality is related to the inner life of man and it begins with his inner journey. All those activities, which make man refined, pure, full of joy, give a feeling of completeness, they all come under spirituality.


आध्यात्मिकता मनुष्यस्य आन्तरिकजीवनेन सह सम्बद्धा अस्ति तथा च तस्य आन्तरिकयात्रायाः आरम्भः भवति। तानि सर्वाणि कार्याणि, ये मनुष्यस्य परिष्कृतं, शुद्धं, आनन्दपूर्णं च कुर्वन्ति, पूर्णतायाः भावः ददति, ते सर्वे आध्यात्मिकतायाः अधः आगच्छन्ति।

Navya Vedanta

  

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स्वामी विवेकानंद ने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया में पेश किया और 19वीं शताब्दी के अंत में हिंदू धर्म को विश्व स्तर पर लाने के लिए अंतर-जागरूकता बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है।

"वेदांत" शब्द का अर्थ है "वेदों का अंत या सार।"


Swami Vivekananda introduced Indian philosophies of Vedanta and Yoga to the Western world and is credited with raising interfaith awareness, bringing Hinduism to the world stage during the late 19th century. 
The word “Vedanta” means the “the end or essence of the Vedas.”


स्वामी विवेकानन्दः वेदान्तस्य योगस्य च भारतीयदर्शनानां पाश्चात्यजगति परिचयं कृतवान् तथा च १९ शताब्द्याः अन्ते हिन्दुधर्मं विश्वमञ्चे आनयन् अन्तरधर्मजागरूकतां वर्धयितुं श्रेयः तस्मै दत्तः
वेदान्तशब्देन “वेदान्तः सारः वा” इत्यर्थः ।

Granth

 


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भारत एक विशाल देश है। विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु में परिवर्तन देखा जाता है। एक राज्य की बोली जाने वाली भाषा अन्य राज्यों से काफी भिन्न होती है। वे तरह-तरह के कपड़े पहनते हैं, अलग-अलग त्योहार मनाते हैं और तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। विभिन्न संस्कृतियों से संबंधित लोग विभिन्न धार्मिक विश्वासों से संबंधित हैं। इसे कहते हैं भारत की एकता।उनके कुछ धर्म ग्रंथ यहां हैं...

India is a large country. Different regions observe changes in climate. The spoken language of one state is quite different from other states. They wear different types of clothes, they celebrate different festivals and play varied religious rituals. People belonging to different cultures belong to different religious beliefs. This is called Unity of India. 
Some of their Dharma Granths are here...

भारतं विशालः देशः अस्ति। विभिन्नेषु प्रदेशेषु जलवायुपरिवर्तनं दृश्यते । एकस्य राज्यस्य वाच्यभाषा अन्येभ्यः राज्येभ्यः सर्वथा भिन्ना भवति । ते विविधानि वस्त्राणि धारयन्ति, ते भिन्नान् उत्सवान् आचरन्ति, विविधान् धर्मान् च कुर्वन्ति । भिन्नसंस्कृतीनां जनाः भिन्नधर्मप्रत्ययानां भवन्ति । एतत् भारतैकता इति कथ्यते ।
तेषां केचन धर्मग्रन्थाः अत्र सन्ति...

Shashtra

 

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शास्त्र का अर्थ विज्ञान है 'शास्त्र' शब्द 'शासु अनुशिष्टौ' से निष्पन्न है जिसका अर्थ 'अनुशासन या उपदेश करना' है। शास्ति च त्रायते च। शिष्यते अनेन। अर्थात् जो शिक्षा अनुशासन प्रदान कर हमारी रक्षा करती है, मार्गदर्शन करती है, कभी-कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलाती है, उसे 'शास्त्र' कहा गया है।

The meaning of Shastra is science. The word 'Shastra' is derived from 'Shasu Anushishtau' which means 'to discipline or preach'. Shasti Ch Trayate Ch. Shishyate Anen. That is, the education which protects us by providing discipline, guides us, sometimes holds our finger and guides us, is called 'Shastra'.

शास्त्रस्य अर्थः विज्ञानम् अस्ति।शास्त्रशब्दः 'शसु अनुशिष्ठौ' इत्यस्मात् निष्पन्नः यस्य अर्थः 'अनुशासनं कर्तुं वा उपदेशं कर्तुं वा' इति। शास्ति च त्रयते छ. शिष्यते अनेन। अर्थात् अनुशासनं प्रदातुं या शिक्षा अस्मान् रक्षति, मार्गदर्शनं करोति, कदाचित् अङ्गुलीं धारयति, मार्गदर्शनं च करोति, सा 'शास्त्रम्' इति उच्यते।

Puran

 


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पुराण संस्कृत में रचित धार्मिक ग्रंथ हैं, जिन्हें दूसरी शताब्दी सीई के बाद से लिखे जाने से पहले सदियों तक मौखिक रूप से सुनाया गया था। वे हिंदू धर्म के पवित्र साहित्य का हिस्सा हैं जिसमें वेद, ब्राह्मण, आर्यंक, उपनिषद और महान महाकाव्य भी शामिल हैं। यज्ञ या वैदिक यज्ञ।

महाभारत के कथाकार व्यास को पुराणों के संकलनकर्ता के रूप में साहित्यिक रूप से श्रेय दिया जाता है।

भारतीय परम्पराओं के अनुसार purana की संख्या 18 है. पुराणों को दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  • महापुराण
  • उपपुराण
महापुराणों की संख्या 18 है और उपपुराण भी 18 हैं.

महापुराण तीन भागों में बाँटे गए हैं –

  1. सात्विक पुराण – सात्विक पुराणों का सम्बन्ध विष्णु से है.
  2. राजस पुराण – राजस पुराणों का ब्रह्मा से है और
  3. तामस पुराण – तामस पुराणों का सम्बन्ध शिव से है.

सात्विक महापुराण

  1. विष्णु purana
  2. भागवत purana
  3. नारद purana
  4. गरुड़ पुराण
  5. पदम पुराण
  6. वराह पुराण

राजस पुराण

  1. ब्रह्म पुराण
  2. ब्रह्मांड पुराण
  3. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  4. मार्कण्डेयपुराण
  5. भविष्य पुराण
  6. वामन पुराण

तामस पुराण

  1. वायु पुराण
  2. लिंग पुराण
  3. स्कन्द पुराण
  4. अग्नि purana
  5. मत्स्य purana
  6. कूर्म purana

इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 18 उपपुराण लिखे गए थे. इनकी दो सूचियां दी गईं. प्रथम और द्वितीय.

18 उपपुराण

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने गरुड़ purana के आधार पर उपपुराणों की जो सूची दी है वह है –

  1. सनत्कुमार
  2. नरसिंह
  3. कपिल
  4. कालिका
  5. साम्ब
  6. पराशर
  7. महेश्वर
  8. सौर
  9. नारदीय
  10. शिव
  11. दुर्वासा
  12. मानव
  13. अनुशासन
  14. वरुण
  15. भसिष्ठा
  16. देवी-भागवत
  17. नंदी
  18. आदित्य

Bhagwat Geeta

 


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श्रीमद भागवत गीता को पढ़ना हमें जीवन के बारे में सच्चाई से परिचित कराता है और अंधविश्वास और झूठी मान्यताओं से मुक्ति पाने में हमारी मदद करता है। गीता से प्राप्त ज्ञान हमारे संदेहों को दूर करता है और हमारे आत्मविश्वास का निर्माण करता है
1. प्रत्येक व्यक्ति इस भौतिक शरीर रूपी रथ पर आरूढ है और बुद्धि इसका सारथी है। मन इसका लगाम है तथा इन्द्रियाँ घोड़े हैं। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियों की संगति से यह आत्मा सुख या दुःख का भोक्ता है।
2. मृत्यु के समय जीव द्वारा विकसित की गई चेतना उसे दूसरे शरीर में ले जाती है
3. कौन क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है और क्यों कर रहा है। इन सब से आप जितना दूर रहेंगे उतना ही आप खुश रहेंगे।
4. अहंकार, घमण्ड, क्रोध और निष्ठुरता ये अज्ञान से उत्पन्न हुए आसुरी प्रकृति के लोगों के भुण हैं, इनका त्याग करना ही हमें अच्छा इंसान बनाता है।
5. मोह उसी का करो जिस पर आपका अधिकार है, जिस पर आपका अधिकार ही नहीं है, उसका मोह भी नहीं करना चाहिए।
6. विषयों वस्तुओं के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है।

Reading Shrimad Bhagwat Geeta introduces us to the truth about life and helps us to get rid of superstition and false beliefs. The wisdom gained from the Gita dispels our doubts and builds our confidence
1. Everyone is mounted on this chariot in the form of the physical body and the intellect is its charioteer. The mind is its reins and the senses are the horses. In this way, this soul is the enjoyer or the sufferer of the mind and senses.
2. The consciousness developed by the Jiva at the time of death takes it to another body
3. Who is doing what, how and why. The more you stay away from all this, the happier you will be.
4. Arrogance, pride, anger and cruelty are the germs of people of demonic nature born out of ignorance, renouncing them makes us a good human being.
5. Be attracted to the one on whom you have the right, you should not be attracted to the one on whom you do not have any right.
By thinking about 6. subjects and objects, a person gets attached to them. Due to this, desire arises in them and anger arises due to disturbance in desires.


श्रीमद्भागवतगीतायाः पठनेन जीवनस्य विषये सत्यस्य परिचयः भवति तथा च अन्धविश्वासात्, मिथ्याविश्वासात् च मुक्तिं प्राप्तुं साहाय्यं भवति। गीतातः प्राप्ता प्रज्ञा अस्माकं संशयं दूरं करोति, अस्माकं विश्वासस्य निर्माणं च करोति
1. अस्मिन् रथे सर्वे भौतिकशरीररूपेण आरुह्यन्ते बुद्धिः च तस्य सारथिः। मनः तस्य लज्जा इन्द्रियाणि वाजाः | एवं मनसा इन्द्रियाणां भोक्ता वा पीडितोऽयं आत्मा ।
2. जीवेन मृत्योः समये विकसिता चैतन्यं तं शरीरान्तरं नयति
3. कः किं करोति, कथं, किमर्थं च। एतस्मात् सर्वेभ्यः यथा यथा दूरं तिष्ठसि तथा तथा सुखी भविष्यसि ।
4. दम्भः, अभिमानः, क्रोधः, क्रूरता च अज्ञानात् जायमानानां आसुरीस्वभावस्य जनानां रोगाणुः सन्ति, तेषां त्यागः अस्मान् सत्पुरुषं करोति।
5. यस्मिन् भवतः अधिकारः अस्ति तस्य प्रति आकृष्टः भवतु, यस्मिन् भवतः अधिकारः नास्ति तस्य प्रति भवतः आकर्षणं न कर्तव्यम्।
6. विषयविषयाणां विषये चिन्तयित्वा तेषु व्यक्तिः आसक्तः भवति । तेन तेषु कामो उत्पद्यते क्रोधश्च कामविकारात् ।

Culture

 


भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है। भारत की संस्कृति दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति है, जिसे लगभग 5000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
सभ्यता को शरीर व संस्कृति को आत्मा माना जाता है, यें एक-दूसरे के पूरक होते है। संस्कृति इस समाज को सभ्य बनती है। किसी भी देश के आदर्श व जीवनयापन का तरीका ही उसकी संस्कृति होती है।
भारत की संस्कृति में धार्मिक संस्कार एवं मान्यताएं है। लोग अपने धर्म के अनुसार परम्पराओं का पालन करते है। भारत समृद्ध संस्कृति वाला देश है, जिसकी सभ्यता से बड़ी सभ्यता कोई नहीं है।
संस्कृति एक समाज की ताकत होती है। वह एक समाज को जोड़कर रखने का कार्य करती है। संस्कार एक व्यक्ति को जीवन जीने का सही तरीका सिखाती है।यें संस्कार हमारी पूंजी होते है, जो मनुष्य को सभ्य बनाते है। यें सामाजिक एकता को बढ़ावा देते है। हमारे देश की संस्कृति हमारें इतिहास को दर्शाती है।

India is a country of various cultures. The culture of India is the oldest culture in the world, believed to be about 5000 years old. Indian culture is famous all over the world.
Civilization is considered as the body and culture as the soul, they complement each other. Culture makes this society civilized. The ideal and way of living of any country is its culture.
Indian culture has religious rites and beliefs. People follow the traditions according to their religion. India is a country with a rich culture, whose civilization has no greater civilization.
Culture is the strength of a society. She does the work of keeping a society together. Sanskar teaches a person the right way to live life. These sanskaras are our capital, which make a human being civilized. They promote social unity. The culture of our country reflects our history.

भारतं विविधसंस्कृतीनां देशः अस्ति । भारतस्य संस्कृतिः विश्वस्य प्राचीनतमा संस्कृतिः, प्रायः ५००० वर्षपुराणी इति मन्यते । भारतीयसंस्कृतिः सम्पूर्णे विश्वे प्रसिद्धा अस्ति ।
सभ्यता शरीरं संस्कृतिश्च आत्मा इति मन्यते, ते परस्परं पूरकाः भवन्ति। संस्कृतिः अस्य समाजस्य सभ्यतां जनयति। कस्यचित् देशस्य आदर्शः जीवनपद्धतिः च तस्य संस्कृतिः एव ।
भारतीयसंस्कृतेः धार्मिकसंस्काराः, विश्वासाः च सन्ति । जनाः स्वधर्मानुसारं परम्परां अनुसरन्ति । भारतं समृद्धसंस्कृतियुक्तः देशः, यस्याः सभ्यतायाः महती सभ्यता नास्ति ।
संस्कृतिः समाजस्य बलम् अस्ति। समाजं एकत्र स्थापयितुं कार्यं सा करोति। संस्कारः व्यक्तिं जीवनस्य सम्यक् मार्गं शिक्षयति।एताः संस्काराः अस्माकं राजधानी सन्ति, येन मनुष्यः सभ्यः भवति। ते सामाजिकैकतां प्रवर्धयन्ति। अस्माकं देशस्य संस्कृतिः अस्माकं इतिहासं प्रतिबिम्बयति।

Astrology


 

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ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है।   

                ज्योतिष को लोग एक धर्मशास्त्र की तरह देखते हैं, परंतु वस्तुतः यह एक विज्ञान है। ज्योतिष के मर्मज्ञ एवं आध्यात्मिक ज्ञान के विशेषज्ञ दोनों ही एक स्वर से इस सच्चाई को स्वीकारते हैं कि मनुष्य जैसे उच्चस्तरीय प्राणी की स्थिति में परिवर्तन उसके कर्मो, विचारों, भावों एवं संकल्पों के अनुसार होता है इसलिए मनुष्य के जन्म के क्षण का विशेष महत्व है यह वही क्षण है जो व्यक्ति को जीवन भर प्रभावित करता है।

                ऐसा क्यों है? इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि प्रत्येक क्षण में ब्राह्मंडीय ऊर्जा की विशिष्ट शक्ति धाराएं किसी-न-किसी बिंदु पर किसी विशेष परिमाण में मिलती हैं। मिलन के इन्हीं क्षणों में मनुष्य का जन्म होता है और इस क्षण में यह निर्धारित हो जाता है कि ऊर्जा की शक्ति धारायें भविष्य में किस क्रम में मिलेंगी और जीवन पर अपना क्या प्रभाव डालेंगी।

                व्यक्ति के जन्म का क्षण सदा ही उसके साथ रहता है। जन्म के क्षण का विशेष महत्व है क्योंकि यह बताता है कि जीवात्मा किन कर्मबीजों, प्रारब्धों व संस्कारों को लेकर किन और कैसे उर्जा-प्रवाहों के मिलन बिंदु के साथ जन्मी है। जन्म का क्षण इस विराट ब्राह्मंड में व्यक्ति को व उसके जीवन को एक विशेष स्थान देता है। यह कालचक्र में ऐसा स्थान होता है जो सदा अपरिवर्तनीय है और इनके मिलन के क्रम के अनुरूप ही सृष्टि, व्यक्ति, जंतु, वनस्पति, पदार्थ, घटनाक्रम इत्यादि जन्म लेते हैं इसी क्रम में उनका विलय-विर्सजन भी होता है।                ज्योतिष विज्ञान के अन्वेषक महर्षियों ने इस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा प्रवाहों को चार चरणों वाले सत्ताइस नक्षत्रों, बारह राशियों एवं नवग्रहों में वर्गीकृत किया है। इनमें होने वाले परिवर्तन क्रम को उन्होंने विंशोत्तर, अष्टोत्तर एवं योगिनी नक्षत्रों के क्रम में देखा है। इनकी अंतर और प्रत्यंतर दशाओं के क्रम में इन ऊर्जा -प्रवाहों के परिवर्तन क्रम की सूक्ष्मता समझी जाती है।

                ज्योतिष विज्ञान को सही ढंग से जान लिया जाए तो मनुष्य अपनी मौलिक क्षमताओं को पहचान सकता है और उन्हें पहचान कर अपने स्वधर्म की खोज भी कर सकता है उस स्थिति में वह कालचक्र में अपनी स्थिति को प्रभावित करने वाले ऊर्जा प्रवाहों के क्रम को पहचान कर ऐसे अचूक उपायों को अपना सकता है जिससे कालक्रम के अनुसार परिवर्तित होने वाले ऊर्जा प्रवाहों के क्रम से उसे क्षति न पहुँचे और इस कालक्रम का ज्ञान किसी को एक योग्य ज्योतिषी ही करा सकता है और ज्योतिष के ज्ञान का यही विशेष महत्व है और इस ज्ञान की महत्वपूर्ण कड़ी एक योग्य ज्योतिषी ही है। जो महादशाओं, अंतर्दशाओं एवं प्रत्यंतरदशाओं में ग्रहों के मंत्र, दान की विधियों, मणियों का प्रयोग आदि बताकर इनके दुष्प्रभावों से आपको बचा सकता है और जीवन में सफलता अर्जित करने का सही मार्ग दिखा सकता है।


Jyotishaan suryadigrahana bodhakam shastram i.e. the science which gives understanding of sun, planet and time is called Jyotish Shastra. In this, mainly the nature of planets, constellations etc., description of events related to communication, travel time, eclipse and position and auspicious results are described. The calculation and representation of the planetary constellations located in the constellations are important for human life and it is also an effective technique for personality test and by this the events that will happen in the future of a person can be detected as well as it can also be known. It is known that what are the fatal obstacles in a person's life that are going to block his path or what misfortune of destiny he will have to bear at what time and at such times astrology is the only medium through which the person can be guided in the right direction. is obtained.

People see astrology as a theology, but in reality it is a science. The connoisseurs of astrology and the experts of spiritual knowledge both unanimously accept the fact that the status of a high-level creature like a human being changes according to his deeds, thoughts, feelings and resolutions, therefore the moment of birth of a human being is of special importance. It is the moment that affects a person throughout his life.
            Why is it like this? In this context, it can be said that at every moment specific power currents of cosmic energy meet at some point or the other in a particular magnitude. It is in these moments of meeting that a human being is born and it is determined in this moment that in what order the currents of energy will meet in the future and what will be their impact on life.
            The moment of a person's birth always remains with him. The moment of birth has special importance because it tells that the soul is born with which Karmabeej, Prarabdhas and Sanskars and with what meeting point of energy-flows. The moment of birth gives a special place to a person and his life in this vast universe. This is such a place in the cycle of time, which is always unchangeable and according to the sequence of their union, creation, person, animal, plant, matter, event etc. are born, in the same order their merger-immersion also takes place.
            Maharishis, the researchers of astrology, have classified this cosmic energy flow into twenty-seven constellations with four phases, twelve zodiac signs and nine planets. He has seen the sequence of changes taking place in these in the order of Vinshottara, Ashtottara and Yogini Nakshatras. The subtlety of the change order of these energy-flows is understood in the order of their inter and inter-change conditions.
            If astrology is known properly, then man can recognize his fundamental abilities and by recognizing them, he can also discover his own religion, in that case he can identify the sequence of energy flows affecting his position in the time cycle and thus One can adopt accurate measures so that he is not harmed by the sequence of energy flows that change according to the timeline and only a qualified astrologer can give knowledge of this timeline and this is the special importance of the knowledge of astrology and the importance of this knowledge. Kadi is only a qualified astrologer. Which can save you from the ill effects of planets by telling mantras, methods of charity, use of gems etc. in Mahadasha, Antardasha and Pratyantardasha and can show you the right path to earn success in life.

ज्योतिशान सूर्यादिग्रहण बोधकं शास्त्रम् अर्थात् सूर्य, ग्रह, काल की अवगमन प्रदान करने वाला विज्ञान ज्योतिष शास्त्र उच्यते। अस्मिन् मुख्यतया ग्रह-नक्षत्र-आदि-स्वभावः, संचार-यात्रा-काल-ग्रहण-स्थान-सम्बद्धानां घटनानां वर्णनं, शुभपरिणामानां च वर्णनं कृतम् अस्ति । नक्षत्रेषु स्थितानां ग्रहनक्षत्राणां गणना, प्रतिनिधित्वं च मानवजीवनाय महत्त्वपूर्णं भवति तथा च व्यक्तित्वपरीक्षायाः कृते अपि एषा प्रभावी तकनीकः अस्ति तथा च एतेन व्यक्तिस्य भविष्ये ये घटनाः भविष्यन्ति तेषां ज्ञापनं कर्तुं शक्यते तथा च एतत् अपि ज्ञातुं शक्यते ज्ञातव्यं यत् कस्यचित् जीवने के के घातकाः विघ्नाः सन्ति ये तस्य मार्गं अवरुद्धं कर्तुं गच्छन्ति अथवा कस्मिन् समये तादृशसमये च तस्य किं दैवस्य दुर्भाग्यं सहितव्यं भविष्यति ज्योतिषः एव एकमात्रं माध्यमं यस्य माध्यमेन व्यक्तिः शक्नोति सम्यक् दिशि मार्गदर्शितः भवेत्।प्राप्यते।

जनाः ज्योतिषशास्त्रं धर्मशास्त्रं पश्यन्ति, परन्तु वस्तुतः एतत् विज्ञानम् एव । ज्योतिषशास्त्रस्य पारखीः आध्यात्मिकज्ञानविशेषज्ञाः च सर्वसम्मत्या एतत् तथ्यं स्वीकुर्वन्ति यत् मनुष्यसदृशस्य उच्चस्तरीयस्य प्राणिनः स्थितिः तस्य कर्म, विचार, भावना, संकल्पानुसारं परिवर्तते, अतः मनुष्यस्य जन्मक्षणः एव भवति क्षणः मनुष्यस्य जीवनपर्यन्तं प्रभावितं करोति।

     किमर्थम् एवम् ? अस्मिन् सन्दर्भे प्रत्येकं क्षणं ब्रह्माण्ड ऊर्जायाः विशिष्टाः शक्तिप्रवाहाः कस्मिन्चित् बिन्दौ अन्यस्मिन् वा विशेषमात्रायां मिलन्ति इति वक्तुं शक्यते एतेषु एव मिलनक्षणेषु मानवः जायते तथा च अस्मिन् क्षणे एव निर्धारितं भवति यत् भविष्ये ऊर्जाधाराः केन क्रमेण मिलन्ति, तेषां जीवने किं प्रभावः भविष्यति इति।

जन्मस्य क्षणः तस्य सदा तिष्ठति । जन्मक्षणस्य विशेषं महत्त्वं वर्तते यतोहि एतत् कथयति यत् आत्मा केन कर्मबीजः, प्ररब्धाः, संस्काराः च सह च ऊर्जा-प्रवाहस्य केन मिलनबिन्दुना सह जायते। जन्मक्षणः अस्मिन् विशाले जगति मनुष्यस्य जीवनस्य च विशेषस्थानं ददाति । एतत् तादृशं स्थानं कालचक्रे सदा अपरिवर्तनीयं तेषां संयोगस्य क्रमानुसारं सृष्टि-पुरुष-पशु-वनस्पति-द्रव्य-घटना इत्यादयः जायन्ते, तथैव क्रमेण तेषां विलय-विसर्जनमपि गृह्णाति स्थानम्‌।

महर्षिभिः ज्योतिषशास्त्रस्य शोधकर्तृभिः अस्य ब्रह्माण्डशक्तिप्रवाहस्य सप्तविंशतिनक्षत्रसमूहेषु वर्गीकृताः येषां चतुर्णां चरणानां, द्वादशराशिनां, नवग्रहाणां च सन्ति । विन्शोत्तर-अष्टोत्तर-योगिनी-नक्षत्र-क्रमेण एतेषु परिवर्तनक्रमं तेन दृष्टम् । एतेषां ऊर्जा-प्रवाहानाम् परिवर्तनक्रमस्य सूक्ष्मता तेषां परिवर्तनान्तर-अन्तर-परिस्थितिक्रमेण अवगम्यते ।

यदि ज्योतिषशास्त्रं सम्यक् ज्ञातं भवति तर्हि मनुष्यः स्वस्य मौलिकक्षमतां ज्ञातुं शक्नोति तथा च तान् ज्ञात्वा स्वस्य धर्मस्य अपि आविष्कारं कर्तुं शक्नोति, तस्मिन् सति सः कालचक्रे स्वस्थानं प्रभावितं कुर्वन्तः ऊर्जाप्रवाहानाम् क्रमं चिन्तयितुं शक्नोति तथा च समीचीनं स्वीकुर्वितुं शक्नोति मापयति येन सः कालरेखानुसारं परिवर्तमानानां ऊर्जाप्रवाहानाम् क्रमेण हानिः न भवति तथा च योग्यः ज्योतिषी एव अस्याः कालरेखायाः ज्ञानं दातुं शक्नोति तथा च एतत् ज्योतिषस्य ज्ञानस्य विशेषं महत्त्वं अस्य ज्ञानस्य च महत्त्वम् अस्ति।कडी अस्ति केवलं योग्यः ज्योतिषी । या महादशा-अन्तर्दश-प्रत्यन्तर्दशयोः मन्त्रान्, दानविधयः, रत्नप्रयोगादिकं कथयित्वा ग्रहाणां दुष्प्रभावेभ्यः उद्धारयितुं शक्नोति तथा च जीवने सफलतां अर्जयितुं सम्यक् मार्गं दर्शयितुं शक्नोति।

Ayurveda


आयुर्वेद पांच हजार साल पुरानी चिकित्सा पद्धति है, जो हमारी आधुनिक जीवन शैली को सही दिशा देने और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी आदतें विकसित करने में सहायक होती है। इसमें जड़ी बूटि सहित अन्य प्राकृतिक चीजों से उत्पाद, दवा और रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इनके इस्तेमाल से जीवन सुखी, तनाव मुक्त और रोग मुक्त बनता है। 

यह शब्द ’आयुष्$वेद‘ इन दो शब्दों के मेल से बना है। ’आयुष्‘ का अर्थ है-’जीवन‘, तथा ’वेद‘ का अर्थ है -विज्ञानं ‘।

इस प्रकार, ’आयुर्वेद‘ शब्द का अर्थ हुआ-’जीवन का विज्ञान‘। साधारण भाषा में कहें तो जीवन को ठीक प्रकार से जीने का विज्ञान ही आयुर्वेद है, क्योंकि यह विज्ञान केवल रोगों की चिकित्सा या रोगों का ही ज्ञान प्रदान नहीं करता, अपितु जीवन जीने के लिए सभी प्रकार के आवश्यक ज्ञान की प्राप्ति कराता है।

बहुत सीमित अर्थ में ही हम इसे एक चिकित्सा प्रणाली भी कह सकते हैं, क्योंकि यह स्वास्थ्य-रक्षा और रोग- निवारण, दोनों के लिए व्यवस्थित और क्रमबद्ध ज्ञान भी प्रस्तुत करता है। वास्तव में यह विज्ञान मनुष्य ही नहीं, अपितु प्राणिमात्र के कल्याण के लिए ही उनके शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक सभी पक्षों पर प्रभाव डालता है। महर्षि चरक ने ’चरक-संहिता‘ नामक ग्रन्थ में आयुर्वेद की परिभाषा देते हुए भी कहा है – जिसमें हित आयु, अहित-आयु, सुख आयु और दुख आयु का वर्णन हो, उस आयु के लिए हितकर (पथ्य) व अहितकर (अपथ्य) द्रव्य, गुण, कर्म का भी वर्णन हो एवं आयु का मान (प्रमाण या अवधि) व उसके लक्षणों का वर्णन हो, उसे आयुर्वेद कहते हैं2। इससे स्पष्ट होता है कि आयुर्वेद के ये सिद्धान्त किसी विशेष व्यक्ति, जाति या देश तक सीमित नहीं हैं, ये सार्वभौम3 (सभी जगह लागू होने वाले) हैं। जिस प्रकार जीवन सत्य है, उसी प्रकार ये सिद्धान्त और नियम भी सभी स्थानों पर मान्य और सत्य हैं, अतः शाश्वत, सार्वभौम एवं सर्वजनीन हैं। इनमें ’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः‘ अर्थात् ’सभी सुखी हों और सभी निरोग हों‘ का भाव निहित है। निष्कर्ष के रूप में आयुर्वेद एक चिकित्सा-पद्धति होने के साथ-साथ एक संपूर्ण जीवन-पद्धति व साधना-पद्धति भी है।

Ayurveda is a five thousand year old system of medicine, which is helpful in giving right direction to our modern lifestyle and developing habits beneficial for health. In this, products, medicines and substances used in everyday life are prepared from other natural things including herbs. Their use makes life happy, stress free and disease free.

The word 'Ayushveda' is made up of a combination of these two words. 'Ayush' means 'life', and 'Veda' means 'science'.

Thus, the meaning of the word 'Ayurveda' is - 'Science of life'. In simple language, Ayurveda is the science of living life properly, because this science does not only provide knowledge of diseases or ailments, but also provides all kinds of necessary knowledge to live life.

In a very limited sense, we can also call it a medical system, because it also presents systematic and systematic knowledge for both health-prevention and disease-prevention. In fact, this science affects not only humans, but all their physical, mental and spiritual aspects for the welfare of all living beings. Maharishi Charak has also given the definition of Ayurveda in the book named 'Charak-Sanhita' - in which there is a description of age of age, age of harm, age of happiness and age of sorrow, beneficial (Pathya) and harmful (Apathy ) for that age. Substance, quality, action should also be described and the value of age (evidence or duration) and its symptoms should be described, it is called Ayurveda. It is clear from this that these principles of Ayurveda are not limited to any particular person, caste or country, they are universal (applicable everywhere). Just as life is true, similarly these principles and rules are also valid and true at all places, hence eternal, universal and universal. In these, the feeling of 'Sarve Bhavantu Sukhinah, Sarve Santu Niramayah' means 'May all be happy and may all be healthy'. In conclusion, Ayurveda is a medical system as well as a complete lifestyle and spiritual practice.


आयुर्वेदः पञ्चसहस्रवर्षीयः चिकित्साव्यवस्था अस्ति, या अस्माकं आधुनिकजीवनशैल्याः सम्यक् दिशां दातुं स्वास्थ्याय लाभप्रदानां आदतीनां विकासाय च सहायकः अस्ति। अस्मिन् दैनन्दिनजीवने प्रयुक्ताः उत्पादाः, औषधानि, पदार्थाः च ओषधीभिः सह अन्येभ्यः प्राकृतिकवस्तूनाभ्यः निर्मिताः भवन्ति । तेषां उपयोगेन जीवनं सुखदं, तनावमुक्तं, रोगमुक्तं च भवति ।

'आयुष$वेद' इति शब्दः एतयोः शब्दयोः संयोगेन निर्मितः । 'आयुष' इत्यर्थः 'जीवनम्', 'वेद' इत्यर्थः 'विज्ञानम्' इति ।

एवं 'आयुर्वेद' शब्दस्य अर्थः - 'जीवनविज्ञानम्' इति । सरलभाषायां आयुर्वेदः जीवनं सम्यक् जीवितुं विज्ञानम् अस्ति, यतः एतत् विज्ञानं न केवलं रोगानाम् अथवा रोगानाम् ज्ञानं प्रदाति, अपितु जीवनं जीवितुं आवश्यकं सर्वं ज्ञानं अपि प्रदाति।

अत्यन्तं सीमितरूपेण वयं तां चिकित्साव्यवस्था इति अपि वक्तुं शक्नुमः, यतः स्वास्थ्यनिवारणस्य रोगनिवारणस्य च कृते व्यवस्थितं व्यवस्थितं च ज्ञानं अपि प्रस्तुतं करोति वस्तुतः एतत् विज्ञानं न केवलं मनुष्यान्, अपितु सर्वेषां शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक-पक्षेषु सर्वेषां प्राणिनां हिताय प्रभावितं करोति । महर्षि चरकेन 'चरक-संहिता' इति पुस्तके आयुर्वेदस्य परिभाषा अपि दत्ता अस्ति - यस्मिन् वयसः, हानिवयो, सुखस्य आयुः, शोकवयोः, हितकरस्य (पाठ्यस्य) हानिकारकस्य च (अपथ्यस्य) वर्णनम् अस्ति । अस्मात् स्पष्टं भवति यत् आयुर्वेदस्य एते सिद्धान्ताः कस्मिंश्चित् व्यक्तिविशेषे, जातिविशेषे, देशे वा सीमिताः न सन्ति, ते सार्वत्रिकाः (सर्वत्र प्रयोज्यः) सन्ति। यथा जीवनं सत्यम्, तथैव एते सिद्धान्ताः नियमाः अपि सर्वत्र मान्याः सत्याः च सन्ति, अतः शाश्वताः, सार्वत्रिकाः, सार्वत्रिकाः च सन्ति । एतेषु 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामायः' इति भावस्य अर्थः 'सर्वे सुखिनः सन्तु सर्वे स्वस्थाः भवन्तु' इति भावः । उपसंहारः आयुर्वेदः चिकित्साव्यवस्था अपि च सम्पूर्णजीवनशैली आध्यात्मिकः अभ्यासः च अस्ति ।